शेखर जोशी की कोसी का घटवार कालजयी रचना है। पढने के बाद मन में एक तडप सी छोड जाती है। लेखक का अभिप्राय भी इस दुख को सांझा करने से है। यदि कहानीकार उस दुख या वेदना को उसी गहनता से पाठक तक पंहुचा सकता है जितनी गहनता से वह खुद व्यथित है तो उसका कहानी लिखना सफल है। उसने कहा था के बाद वैसी ही वेदना मुझे इस कहानी को पढकर हुई।
कभी चार पैसे जुड जाए तो गंगनाथ् का जागगर लगार
भूल चूक की माफी मांग लेना। पूत परिवारवालों को देवी देवता के कोप से बचा रहना चाहिए। यह पंक्तियां सीधे
मर्म पर चोट कर करती है।
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